Book Review: गुनाहों का देवता

गुनाह का देवता — या देवता का गुनाह?

एक दृश्य भूमिका: आवरण का मौन उपन्यास के पाठ में उतरने से पहले, इसके मुखपृष्ठ (cover page) पर दृष्टि डालना आवश्यक है। आवरण पर अंकित दो अमूर्त, मिट्टी के रंग की आकृतियाँ—जो एक-दूसरे से विमुख, पथरीली सीढ़ियों पर बैठी हैं—इस कथा के मूल स्वर को परिभाषित कर देती हैं। यह दृश्य अलगाव और भावनात्मक दूरी का प्रतीक है। मुखपृष्ठ के कोने में अंकित पंक्तियाँ इस द्वंद्व को और गहरा करती हैं:

"कौन-सा गुनाह? कैसा गुनाह? किसी से ज़िन्दगी भर स्नेह रखने, प्रेम करने का गुनाह... स्नेह और प्रेम जब अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचने लगे तो उसका त्याग करने का गुनाह... है ना अजीब बात!"

गुनाहों का देवता को पढ़ते हुए बार-बार यह अनुभव होता है कि यह उपन्यास प्रेम की कथा कम और प्रेम के स्थगन की कथा अधिक है। यहाँ प्रेम उपस्थित है, गहरा है, लगभग निर्विवाद है, फिर भी उसे उस रूप में स्वीकार नहीं किया जाता जिसमें वह स्वाभाविक रूप से प्रकट होना चाहता है। यही अस्वीकार इस उपन्यास की संवेदना को विशिष्ट बनाता है और साथ ही उसे प्रश्नों के घेरे में भी खड़ा करता है। चन्दर और सुधा का संबंध इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। उनके बीच की निकटता किसी भी औपचारिक संबंध से अधिक सघन है—एक ऐसी सहजता, जिसमें अधिकार है, विश्वास है, और एक गहरी भावनात्मक निर्भरता भी। चन्दर स्वयं इस संबंध को स्वीकारते हुए कहता है

“मेरी ज़िंदगी में एक ही विश्वास की चट्टान है — वह तुम हो…”

यह स्वीकार केवल स्नेह का नहीं, बल्कि एक प्रकार की आंतरिक संरचना का संकेत है जिसमें सुधा उसके अस्तित्व का केंद्र बन जाती है। लेकिन इसी के साथ एक विचित्र स्थिति उत्पन्न होती है—इतनी गहनता के बावजूद यह संबंध कभी अपने नाम तक नहीं पहुँचता। यह मौन केवल संकोच नहीं है; यह एक विचारित ठहराव है, जैसे चन्दर उस बिंदु तक पहुँचकर स्वयं ही पीछे हट जाता है जहाँ प्रेम को स्पष्ट होना चाहिए।

चन्दर अपनी भावनाओं को नकारता नहीं है; वह उन्हें रूपांतरित करता है। वह प्रेम को त्याग में, इच्छा को पवित्रता में, और निकटता को नैतिक ऊँचाई में बदल देता है। इस प्रक्रिया में वह स्वयं को एक ऐसे स्थान पर स्थापित करता है जहाँ वह अपने अनुभव का उपभोग तो कर सकता है, लेकिन उसकी जिम्मेदारी से बच भी सकता है। सुधा के विवाह के प्रसंग में यह बात और स्पष्ट हो जाती है। वह केवल परिस्थितियों का शिकार नहीं है; वह उस पूरी प्रक्रिया का सक्रिय भागीदार है जो उनके संबंध को समाप्त करती है।

सुधा का स्वर यहाँ विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। वह चन्दर के निर्णय को अस्वीकार नहीं करती, बल्कि उसे एक उच्चतर अर्थ देती है—

“तुमने जो कुछ दिया है, वह प्यार से कहीं ऊँचा और महान है…”

यह वाक्य पहली दृष्टि में त्याग की स्वीकृति प्रतीत होता है, लेकिन भीतर से यह उस संरचना को भी उजागर करता है जिसमें प्रेम को उसके स्वाभाविक रूप में स्वीकार करने के बजाय उसे “महानता” के नाम पर पुनर्परिभाषित किया जाता है। यहाँ यह प्रश्न अनिवार्य हो जाता है कि क्या प्रेम को “ऊँचा” बना देना वास्तव में उसे सुरक्षित रखना है, या उससे बच निकलने का एक सुसंस्कृत तरीका?

उपन्यास में चन्दर का “देवता” बनना इसी प्रक्रिया का चरम है। वह अपने अनुभव को इस तरह रूपांतरित करता है कि वह मानवीय जटिलताओं से ऊपर उठता हुआ प्रतीत हो। लेकिन यह ऊँचाई जितनी आकर्षक है, उतनी ही संदिग्ध भी। एक जगह संकेत मिलता है

“देवताओं की पूजा होती है, उन्हें जीया नहीं जाता…”

यह कथन केवल प्रतीकात्मक नहीं है; यह चन्दर की स्थिति का सटीक वर्णन है। जैसे ही वह देवत्व ग्रहण करता है, वह अपने ही अनुभव से दूर हो जाता है। प्रेम उसके लिए एक जीवित अनुभव नहीं रह जाता, बल्कि एक विचार, एक आदर्श, एक स्मृति बन जाता है। सुधा इस पूरे परिदृश्य में सबसे अधिक प्रभावित होती है। उसका प्रेम प्रत्यक्ष नहीं, बल्कि विश्वास के रूप में प्रकट होता है—एक ऐसा विश्वास जो धीरे-धीरे उसकी सीमाओं में बदल जाता है। वह चन्दर के निर्णयों को स्वीकार करती है, लेकिन उसके भीतर जो प्रश्न हैं, वे पूरी तरह कभी व्यक्त नहीं हो पाते। जब वह कहती है

“हिन्दुस्तानी नारी इतनी असहाय होती है…”

तो यह केवल सामाजिक टिप्पणी नहीं है; यह उस व्यक्तिगत स्थिति का भी उद्घाटन है जिसमें वह स्वयं को पाती है। यहाँ यह स्पष्ट हो जाता है कि उसकी त्रासदी केवल प्रेम की असफलता नहीं है, बल्कि उस संरचना का परिणाम है जिसमें उसकी निर्णय-शक्ति सीमित कर दी जाती है—और इस संरचना में चन्दर भी पूरी तरह निर्दोष नहीं ठहराया जा सकता।

पम्मी का प्रवेश इस पूरे ताने-बाने को एक अलग दिशा देता है। जहाँ सुधा के साथ चन्दर का संबंध “पवित्र” बना रहता है, वहीं पम्मी के साथ वह उसी शरीर और इच्छा को स्वीकार करता है जिसे वह पहले नकारता रहा था। इस विरोधाभास का चरम तब सामने आता है जब वह कहता है

“आज मैं विश्वास करता हूँ कि प्यार के मायने सिर्फ़ एक हैं — शरीर का संबंध…”

यह कथन केवल निराशा का परिणाम नहीं है; यह उस पूरी नैतिक संरचना के विघटन का संकेत है जिसे चन्दर ने स्वयं निर्मित किया था। अब “पवित्र” और “मांसल” के बीच का विभाजन टिक नहीं पाता। इससे यह स्पष्ट होता है कि उसका पूर्व आदर्श स्थायी सत्य नहीं था, बल्कि एक चयनित दृष्टि थी। इस संदर्भ में “गुनाह” का अर्थ भी बदलने लगता है। यह केवल सामाजिक नियमों का उल्लंघन नहीं रह जाता, बल्कि उस आंतरिक प्रक्रिया का हिस्सा बन जाता है जिसमें व्यक्ति अपनी ही भावना को दबा देता है। चन्दर स्वयं जिस प्रश्न से जूझता है—

“क्या पवित्रता, त्याग और दूरी, संबंध को जीवित नहीं रहने देते?”

वह इस उपन्यास का केंद्रीय प्रश्न बन जाता है। और यदि इसका उत्तर नकारात्मक है, तो चन्दर का पूरा निर्णय पुनर्विचार की माँग करता है।

चन्दर के 'गुनाह': एक संक्षिप्त विश्लेषण

प्रेम को 'देवत्व' में बदलने का गुनाह: चन्दर का सबसे बड़ा अपराध यह है कि वह प्रेम को एक सामान्य मानवीय अनुभूति के रूप में स्वीकार करने के बजाय उसे 'पवित्रता' और 'आदर्श' की वेदी पर चढ़ा देता है। वह सुधा को एक हाड़-मांस की स्त्री के बजाय एक 'मूर्ति' की तरह पूजने लगता है, जिससे प्रेम का स्वाभाविक स्वरूप नष्ट हो जाता है।

सुधा की 'एजेंसी' (निर्णय-शक्ति) छीनने का गुनाह: चन्दर खुद को 'त्यागी' और 'महान' सिद्ध करने के लिए सुधा के जीवन का फैसला स्वयं ले लेता है। वह उससे बिना पूछे, उसे एक ऐसे विवाह में धकेल देता है जिसे वह नहीं चाहती थी। यह 'महानता' के मुखौटे के पीछे छिपा हुआ एक नैतिक अत्याचार है।

जिम्मेदारी से भागने (पलायन) का गुनाह: जिसे वह 'त्याग' कहता है, वह वास्तव में प्रेम की जिम्मेदारियों और संघर्षों से बचने का एक सुसंस्कृत तरीका है। वास्तविक जीवन की चुनौतियों का सामना करने के बजाय, वह 'बलिदान' का रास्ता चुनता है क्योंकि वह आसान और अधिक 'सम्मानजनक' प्रतीत होता है।

भावनाओं के दमन और पाखंड का गुनाह: चन्दर अपने भीतर की इच्छाओं को दबाता है और खुद को एक 'देवता' के रूप में प्रस्तुत करता है। बाद में पम्मी के साथ उसके संबंध यह साबित करते हैं कि उसकी 'पवित्रता' कोई स्थायी सत्य नहीं, बल्कि एक मानसिक भ्रम था। यह स्वयं से किया गया एक बड़ा छल है।

आदर्शवाद के नाम पर विनाश का देवता बनना: चन्दर उस पूरी त्रासदी का रचयिता (Architect) है जो अंततः सुधा की मृत्यु और उसके स्वयं के मानसिक विघटन का कारण बनती है। वह 'देवता' तो है, लेकिन उस 'विनाश' का जिसे उसने अपने ही तथाकथित ऊँचे सिद्धांतों से रचा था।

इस प्रकार गुनाहों का देवता एक सीधी प्रेम-कथा नहीं रह जाता; यह उस मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक संरचना का अध्ययन बन जाता है जिसमें व्यक्ति अपनी ही संवेदनाओं को नियंत्रित करके उन्हें एक आदर्श में बदल देता है। चन्दर का देवत्व उसकी महानता का प्रमाण कम और उसकी सीमाओं का संकेत अधिक प्रतीत होता है। वह प्रेम करता है, लेकिन उसे जीने के बजाय उसे रूपांतरित करता है—और शायद इसी रूपांतरण में वह उसे खो भी देता है।

सवाल यह भी उठता है कि सुधा ने चन्दर से अलग होकर अपने जीवन में आगे बढ़ने का निर्णय क्यों नहीं लिया? क्या वह चाहती तो अपने प्रेम से मुक्त होकर एक नया जीवन नहीं चुन सकती थी? इस संदर्भ में Rama और Sita की कथा याद आती है, जहाँ परिस्थितियों के कारण दोनों अलग हो जाते हैं, फिर भी सीता अंततः अपने आत्मसम्मान के साथ एक स्वतंत्र निर्णय लेती हैं।

लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर है। राम और सीता की कथा में ‘देवत्व’ एक सामाजिक और धार्मिक आदर्श के रूप में स्थापित है, जबकि चन्दर का ‘देवत्व’ उसका स्वयं निर्मित नैतिक ढाँचा है। सुधा के पास न तो सीता जैसी सामाजिक स्वीकृति है, न ही वैसी स्वतंत्रता कि वह अपने निर्णय को पूर्ण रूप से जी सके। उसका ‘न आगे बढ़ पाना’ केवल व्यक्तिगत कमजोरी नहीं, बल्कि उस भावनात्मक और सामाजिक संरचना का परिणाम है जिसमें वह बंधी हुई है।

इस तरह, जहाँ सीता का अलग होना एक प्रकार की मुक्ति बनता है, वहीं सुधा का न अलग हो पाना उसकी त्रासदी को और गहरा कर देता है।

अंततः यह उपन्यास किसी एक निष्कर्ष पर नहीं पहुँचाता, बल्कि एक असुविधाजनक स्थिति में छोड़ देता है, जहाँ यह तय करना कठिन हो जाता है कि चन्दर को एक त्यागी के रूप में देखा जाए या एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जिसने अपने ही अनुभव से दूरी बना ली। और शायद यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है—यह हमें केवल कथा नहीं देता, बल्कि हमें अपनी ही समझ की सीमाओं के साथ छोड़ देता है।

References 

Bharti, Dharmveer. Gunahon Ka Devta. Jnanpith Vani Prakashan LLP, 2024.

No comments:

Post a Comment

Blogs

Book Review: गुनाहों का देवता

गुनाह का देवता — या देवता का गुनाह? एक दृश्य भूमिका: आवरण का मौन उपन्यास के पाठ में उतरने से पहले, इसके मुखपृष्ठ (cover page) पर दृष्टि डाल...

Must Read